मिशन सुप्रीम कोर्ट ग्रुप ने 32000 शिक्षामित्रों को मौलिक नियुक्ति दिए जाने, शिक्षामित्रों के प्रशिक्षण की वैधता और मिशन की याचिकाओं को निर्णीत किये बिना शिक्षामित्र समायोजन केस निर्णीत न करने के संबंध में *दायर 3 याचिकाओं की सुनवाई फरवरी के दूसरे सप्ताह में होना सुनिश्चित है।*
उक्त सभी याचिकाओं पर मिशन सुप्रीम कोर्ट समूह की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्त कॉलिन गोंसाल्विस सहित अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता शिक्षामित्रों का पक्ष रखेंगे।।
★आजीविका और मान सम्मान से कोई समझौता नहीं।।
©मिशन सुप्रीम कोर्ट ग्रुप।।
Monday, January 23, 2017
*शिक्षामित्र समायोजन केस और 32000 शिक्षामित्रों की मौलिक नियुक्ति सम्बन्धी मामलों की सुनवाई फरवरी के दूसरे सप्ताह में होगी।*
Thursday, October 20, 2016
शिक्षक बनाम शिक्षामित्र मामले में आया नया मोड़। एक अन्य बेंच में हुई 4 अक्टूबर को सुनवाई।
*बड़ी खबर:* *बिग ब्रेकिंग न्यूज़*
जैसा कि मिशन सुप्रीम कोर्ट शिक्षामित्र समाज को अवगत करा चुका है कि शिक्षामित्रों के खिलाफ एक अन्य बेंच में सुनवाई चल रही है। 4 अक्टूबर की सुनवाई का आज आदेश आ गया है जिस के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:-
# *शिक्षामित्र बनाम शिक्षक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी का किया गठन।*
# *ये कमेटी योग्य शिक्षकों की आवश्यकता और नियुक्ति पर विस्तृत रिपोर्ट देगी।*
# *चार सप्ताह में जमा होगी रिपोर्ट अगली सुनवाई 28 नवम्बर को है।*
# *कोर्ट ने 'न्यूपा' से भी शिक्षकों और शिक्षामित्रों का ब्यौरा समस्त तीन सप्ताह में हलफनामे के साथ तलब किया।*
मिशन सुप्रीम कोर्ट आप सब से पुनः अपील करता है कि आप सब कोर्ट के मामले में हमारा सहयोग करें और हौसला बढ़ाएं।
उक्त सुनवाई का विवरण हम आप को कल की पोस्ट में विस्तार से बताएँगे।
*ध्यान रहे! शिक्षामित्रों के करोड़ों रूपये सुनवाई के नाम पे बर्बाद करने वाले लोग इस सारे मामले पे अंधे बहरे बने हुए है।*
मिशन सुप्रीम कोर्ट समूह के वर्किंग ग्रुप मेंबर्स रबी बहार, केसी सोनकर, माधव गंगवार और साथी आप सब को विश्वास दिलाते हैं कि हम किसी भी धोखे का मुंह तोड़ जवाब देने में सक्षम हैं।
★आजीविका और मान सम्मान से कोई समझौता नहीं।।
©मिशन सुप्रीम कोर्ट।।
Sunday, October 9, 2016
12 सितम्बर 2015 के हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया।
*There will be a confusion.*
12 सितम्बर 2015 के हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया।
2 नवम्बर 2015 को 12 सितम्बर 2015 का फैसला आ जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा *there will be a confusion.*
जो हाई कोर्ट की पूर्ण पीठ ने इतनी बड़ी संख्या में नियुक्त शिक्षामित्रों का समायोजन रद्द कर दिया।
अब जबकि नवम्बर में पुनः सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है ऐसे में कोर्ट पैर्विकारों का एक मात्र लक्ष्य कोर्ट के कंफ्यूज़न को दूर करना होना चाहिए।
लेकिन अब तक इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया है।
*कोर्ट का कंफ्यूज़न क्या है?*
हाई कोर्ट की पूर्ण पीठ को ये कंफ्यूज़न था कि *शिक्षामित्र एक योजना के अंतर्गत नियुक्त सामुदायिक सेवाकर्मी हैं या संविदा शिक्षक हैं या फिर अप्रशिक्षित अध्यापक जो प्रशिक्षित हो चुके हैं।*
और इसी कंफ्यूज़न को विपक्षी बेरोज़गारों ने और बढ़ाया और शिक्षामित्रों को कोर्ट से सामुदायिक सेवाकर्मी सिद्ध करवा दिया।
उस समय कोर्ट में पैरवी कर रही राज्य सरकार और शिक्षामित्र संघ और टीम भी इस कंफ्यूज़न को दूर करने में नाकाम रहे। और शिक्षामित्रों का समायोजन रद्द हो गया।
*क्या अब भी ये कंफ्यूज़न दूर हो सकता है?*
जी हाँ। ये कंफ्यूज़न अब भी दूर हो सकता है। इसे दूर करने के लिए मिशन सुप्रीम कोर्ट समूह के रबी बहार, केसी सोनकर और साथियों द्वारा अपने अथक प्रयासों से ठोस साक्ष्य और विधिक तथ्य जमा किये गए हैं।
ताकि कोर्ट का कंफ्यूज़न दूर हो। इन साक्ष्यों को कोर्ट के समक्ष रखने के लिए अलग से याचिका की तैयारी है। *जिस के लिए जागरूक शिक्षामित्रों का सहयोग आपेक्षित है।*
★आजीविका और मान सम्मान से कोई समझौता नहीं।
©मिशन सुप्रीम कोर्ट।।
Tuesday, October 4, 2016
17 नवम्बर को होगी शिक्षक भर्ती की सुनवाई!
जैसा कि कल ही आप को अवगत कराया गया था कि
जस्टिस दीपक मिश्र और जस्टिस यु यु ललित की इस सुनवाई वाली बेंच 1 बजे तक की है इसलिए केस की सुनवाई रेगुलर हियरिंग के रूप में होगी। पिछली सुनवाई की तरह मेंशनिंग के तौर पे जज साहब के दिशा निर्देश जारी होगे और 23 नवम्बर की डेट मिलेगी।
जो कि 23 नवंबर को कोर्ट पहले ही सुनिश्चित कर चुका है। मेरिट पे सुनवाई सिर्फ शिक्षक भर्ती की ही होगी। उसमे भी अगली डेट मिलने की प्रबल सम्भावना है।
■ठीक यही हुआ कोर्ट ने भारी अफरातफरी के माहौल में 72825 शिक्षक भर्ती की डेट 17 नवम्बर लगा के बात खत्म कर दी। विस्तार से कोर्ट आर्डर आने पर जानकारी दी जायेगी।
सुनवाई में "मिशन सुप्रीम कोर्ट" समूह की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोन्साल्विस, अधिवक्ता फ़िडेल सेबेस्टियन और अधिवक्ता(एओआर) ज्योति मेंदिरत्ता उपस्थित रहें
अब चूँकि मिशन सुप्रीम कोर्ट समूह द्वारा लिखित बहस के बिंदु कोर्ट में पहले ही 26 जुलाई को जमा किये जा चुके हैं, और केस मेरिट पे आने पे अकाट्य साक्ष्यों के साथ हाइकोर्ट के फैसले के हर हर बिंदु का जवाब तैयार कराया गया है।
मिशन सुप्रीम कोर्ट के वर्किंग ग्रुप मेंम्बर्स रबी बहार, केसी सोनकर, माधव गंगवार और साथियो* ने अपने वकील के माध्यम से अपनी बात कोर्ट के समक्ष रखने की पूरी तैयारी की है। अब बस इंतज़ार है तो बस फाइनल बहस का।
★आजीविका और मान सम्मान से कोई समझौता नहीं।
©मिशन सुप्रीम कोर्ट।।
Friday, September 23, 2016
उत्तराखण्ड हाई कोर्ट ने शिक्षामित्र समायोजन रद्द किया!!
जैसाकि हमने अपनी पिछली पोस्ट में बताया था कि
ललितकुमार व अन्य बीएड धारकों ने शिक्षामित्र समायोजन केस पर आइए याचिका दायर कर कहा है कि वह शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण हैं, मगर सरकार ने उन्हें नियुक्ति देने के बजाय शिक्षा मित्रों को नियुक्ति दे दी और उन्हें पात्रता के बावजूद वंचित कर दिया गया। न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई पुनः शुरू कर दी है।इससे पूर्व इस मामले में स्थगन आदेश हो चूका था और मामला पेंडिंग था लेकिन कुछ बीएड बेरोज़गारों ने आइए डाल के सुनवाई पुनः शुरू करवा दी । इस केस की पहली सुनवाई 2 अगस्त को हुई और दूसरी सुनवाई के लिए कोर्ट ने प्रतिवादियों राज्य सरकार एनसीटीई को हलफनामा दाखिल करने को 3 सप्ताह का समय दिया। इस मामले पर अगली सुनवाई 15 सितम्बर को हुई जिसमें कोर्ट से बीएड धारक याचिकाकर्ता द्वारा भारत सरकार को पार्टी बनाने और याचिका में संशोधन करने की मांग की गई जिसे स्वीकार कर लिया गया और दो दिन में इसे संशोधित कर जमा करने को कहा गया साथ ही भारत सरकार की तरफ से मौजूद अधिवक्ता को दस्ती नोटिस जारी किया गया।
अगली तारीख 23 सितम्बर थी जिसमे सुनवाई हुई और केस की सुनवाई की अगली तारीख 26 सितम्बर लगा दी।
उपरोक्त विवरण से ये साफ़ होता है कि सुनवाई मेरिट पे हो रही है और जल्दी ही केस का फैसला हो जायेगा।
*अब चूंकि मीडिया के माध्यम से ये सुचना मिली है कि समायोजन रद्द करने का फैसला दिया गया है ऐसे में
अब उत्तराखंड के 3300 शिक्षामित्रों की निगाहें भी सुप्रीम कोर्ट में चल रहे यूपी के शिक्षामित्रों पर टिकी हैं।*
उत्तराखंड के मामले में भी राज्य सरकार की गलती से समायोजन रद्द हुआ और यूपी में भी राज्य के अधिकारियों के टेट छूट मांगने के कारण समायोजन रद्द हुआ। शिक्षामित्र जब पूर्व नियुक्त अध्यापक के रूप में श्रेणीकृत हैं तो इन पर टेट परीक्षा लागू ही नहीं होती है। ये तथ्य यूपी की राज्य सरकार न तो अपने नियमावली संशोधन में स्थापित कर पाई न ही कोर्ट में। इसी तरह उत्तराखंड में भी टेट छूट को आधार बनाया गया जबकि टेट से छूट नहीं दी जा सकती।
अब चूंकि मिशन सुप्रीम कोर्ट समूह अपने द्वारा जमा किये गए साक्ष्यों से सुप्रीम कोर्ट में शिक्षामित्रों को पूर्व नियुक्त शिक्षक सिद्ध करने के लिए लड़ रहा है ऐसे में यूपी के समायोजन केस का निर्णय देश भर के संविदा शिक्षकों का भविष्य तय करेगा ऐसा प्रतीत होता है।
मिशन सुप्रीम कोर्ट समूह देश भर के पारा शिक्षकों के मामले पर नज़र रखे है और सुप्रीम कोर्ट से न्यायोचित फैसले के लिए जी जान से जुटा है।
★आजीविका और मान सम्मान से कोई समझौता नहीं।।
©रबी बहार, केसी सोनकर, माधव गंगवार और साथी*।।
Saturday, September 17, 2016
नई शिक्षा नीति का संविदा शिक्षकों पर प्रभाव।
नई शिक्षा नीति 2015 के ड्राफ्ट और सुब्रमणियम समिति की शिफारिशो पर काफी समय से चर्चा चल रही है।
हाल फिलहाल शिक्षानीति का इनपुट सार्वजानिक किया गया जिस पर लोगों के सुझाव आमंत्रित किये गए हैं।
*इस इनपुट का एक बिंदु ये भी है कि वर्तमान में कार्यरत समस्त संविदा शिक्षकों के स्थान पर नियमित शिक्षक रखे जाएँ।*
उपरोक्त तथ्य मार्च 2010 में आरटीई एक्ट के ड्राफ्ट में भी शामिल किया गया। इस में कहा गया कि अब कोई भी संविदा शिक्षक नियुक्त नहीं किया जायेगा और जो भी लोग इस श्रेणी के हैं उन्हें पांच वर्ष के अंदर प्रशिक्षित कर उनकी अर्हता पूरी करवाई जाएगी।
*नयी शिक्षा नीति का उक्त बिंदु इसी को पूरा करने की बाध्यता निर्धारित करता है*
उत्तर प्रदेश के लगभग 30000 प्रशिक्षित शिक्षामित्र इस बिंदु से लाभान्वित होने से वंचित हैं। सुप्रीम कोर्ट में वाद विचारधीन है, जिसका निस्तारण होने पे ये लोग भी नियमित शिक्षक की श्रेणी में आ जायेंगे।
*नयी शिक्षानीति के उक्त बिंदु का सर्वाधिक लाभ या नुक्सान झारखण्ड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल के संविदा शिक्षकों को होगा। अगर ये लोग राज्य से नियमित नहीं करवा पाये तो नुक्सान और करवा पाये तो लाभ*
हालाँकि वर्तमान में इसकी कोई गुंजाईश नहीं है क्योंकि संवाददाताओं से बातचीत में केंद्रीय शिक्षामंत्री प्रकाश जावडेकर ने स्पष्ट किया कि सरकार ने नयी शिक्षा नीति को अभी अंतिम रूप नहीं दिया है और मसौदा नीति को अभी चर्चा के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जाना है।
उन्होंने कहा, ‘‘सरकार मसौदा को शिक्षा विशेषज्ञों के समक्ष चर्चा के लिए रखेगी और इसके बाद मसौदा नीति को कैबिनेट के समक्ष रखा जायेगा । ’’
सरकार ने प्रस्तावित शिक्षा नीति 2015 के लिए गांव से राज्य स्तर तक राय मांगी है। उन्होंने कहा कि लोग 30 सितंबर तक माईगॉवडाटइन पर सुझाव भेज सकते हैं।
★आजीविका और मान सम्मान से कोई समझौता नहीं।।
©रबी बहार, केसी सोनकर और साथी।
Sunday, September 4, 2016
शिक्षा का ठेका और ठेके के शिक्षकों का शिक्षक दिवस।।
आज देश भर के शिक्षक जब शिक्षक दिवस मना रहे हैं ऐसे में देश के लगभग 6 लाख शिक्षक जिन्हें राज्य सरकारों ने न तो शिक्षक का पद नाम ही दिया है और न ही शिक्षक का दर्जा। वे अपनी आजीविका और मान सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं।
आज़ादी के 70 साल बाद भी देश में ठेके पे शिक्षक रखे जाने की प्रथा का अंत नहीं हो सका। देश में आज भी 6 लाख ठेका शिक्षक तैनात हैं और तैनात किये जा रहे हैं।
झारखण्ड, मध्य प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजिस्थान आदि के पैरा शिक्षकों में उत्तर प्रदेश और झारखण्ड के शिक्षक आज शिक्षक दिवस का बहिष्कार करने को मजबूर हैं।
आंदोलनरत है उत्तर प्रदेश के पैरा शिक्षक:-
आज पांच सितम्बर को उत्तर प्रदेश के 26000 पैरा शिक्षक लखनऊ में धरने पे बैठे हैं।
ये कैसा शिक्षक दिवस है जिस में आजीविका और मान सम्मान के लिए एक शिक्षक सड़क पर आ गया है।
वर्ष 2005 में जब आरटीई अधिनियम लागू करने के लिए राज्यों से बात की गई तो राज्यों का कहना था कि हमारे पास शिक्षकों के लिए धन का अभाव है। अब जबकि 2010 में आरटीई लागू करने को राजी हुए तो तै हुआ कि इस संवैधानिक वाध्यता के अधीन सभी राज्य नियमित शिक्षक रखेंगे। और इनको नियमित करने की समय सीमा 31 मार्च 2015 रखी गई।
लेकिन अधिकाँश राज्य इस मद में धन तो पा रहे हैं लेकिन एक शिक्षक को उसका अधिकार नहीं दे रहे।
क्या कहता है आरटीई एक्ट:-
अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की धारा 23(3) में स्पष्ट उल्लेख है कि प्रत्येक शिक्षक कार्य करने वाले व्यक्ति को वेतन भत्ते और अन्य सुविधाएं दी जाएँ।
लेकिन राज्य की सरकारों ने इस क़ानून का मज़ाक बना के रख दिया है। यूपी के 26000 लोग मात्र 3500 रूपये में जीवन यापन करने को मज़बूर हैं। और खून के आंसू रो रहे हैं। झारखण्ड में 5000 रूपये तो अन्य राज्यों में 8 और 12000 रूपये में ज़िन्दगी घसीट रहे हैं।
हमने सोचा था कि हाकिम से करेंगे फरयाद।
वो भी कमबख्त तेरा चाहने वाला निकला।।
जबकि ये तब है जब देश की सर्वोच्च अदालत को आरटीई एक्ट के लागू करने की निगरानी करने का दायित्व सौंपा गया है।
हुआ इसका उल्टा एक तरफ हिमाचल हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने तो अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए सभी ठेका शिक्षकों को नियमित करने का आदेश दिया वहीँ दूसरी तरफ उसी साल में यूपी के मुख्य न्यायाधीश ने नियमित का हटाने का आदेश दिया।
अब मामला देश की सर्वोच्च अदालत के सामने है। उम्मीद की जाती है कि वो संविधान की रक्षा करते हुए देश भर के पैरा शिक्षकों को नियमित कर के उन्हें शिक्षक का सम्मान देने का आदेश करेगीे। और देश के 6 लाख ठेका शिक्षक ठेके की शिक्षा व्यवस्था से निजात पाएंगे। और 5 सितम्बर 2017 का शिक्षक दिवस शिक्षक के रूप में मनाएंगे।
★आजीविका और मान सम्मान से कोई समझौता नहीं।।
©रबी बहार, केसी सोनकर, माधव गंगवार और साथी*।
मिशन सुप्रीम कोर्ट।।
Sunday, August 28, 2016
शिक्षामित्र समायोजन केस का 72825 भर्ती से डिटैग होने के निहितार्थ।
24 अगस्त की सुनवाई में "मिशन सुप्रीम कोर्ट" समूह की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोन्साल्विस, अधिवक्ता ज्योति मेंदिरत्ता उपस्थित रहे और "मिशन सुप्रीम कोर्ट" के वर्किंग ग्रुप मेंम्बर्स रबी बहार, केसी सोनकर, माधव गंगवार और साथियो* ने अपने वकील के माध्यम से अपनी बात कोर्ट के समक्ष रखने की पूरी तैयारी की थी। बस इंतज़ार था तो बस फाइनल बहस का। लेकिन केस का नंबर आते ही जज महोदय ने 23 नवंबर की तारीख लगाते हुए शिक्षामित्र समायोजन के 72825 भर्ती मामले से अलग कर दिया।
पूरी सुनवाई मिशन सुप्रीम कोर्ट समूह के अनुमान अनुरूप हुई जैसा कि हम अपनी पिछली पोस्ट में बता चुके थे।
आइये अब इसके निहितार्थ को समझते हैं।
72825 शिक्षक भर्ती मामले से समायोजन केस अलग होना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कोर्ट शिक्षक भर्ती मामले को 5 ओक्टूबर को निबटा कर इनका लोकस खत्म करना चाहता है। साथ ही 72825 से अधिक एक भी याची के पक्ष में नहीं है। यही कारण है कि बीएड बीटीसी बेरोज़गारों का मनोबल 24 अगस्त से टूट चुका है और वे गहरी निराशा के गर्त में है।
समायोजन मामले पर अब चूँकि 23 नवंबर को सुनवाई होगी और ये सुनवाई मेरिट पर होगी। ऐसा प्रतीत होता है। सभी पार्टीज़ से लिखित बहस के बिंदु मांगे जा चुके हैं। संयुक्त सक्रिय संघ को छोड़ कर लगभग सभी ने ये बिंदु जमा कर दिए हैं। चूँकि कोर्ट के समक्ष बड़ी संख्या में एसएलपी डाली गई हैं जिन पर 100 से अधिक वकील खड़े होंगे। ऐसे में उक्त लिखित बिन्दुओ के आधार पर कोर्ट बहस करायेगा। ताकि सिर्फ सीनियर अधिवक्ता ही बोल सकें वो भी तब जब राज्य सरकार के वकील की बहस पूरी हो जाये तब। यहाँ उन लोगों को मौका मिलेगा जो अपनी बात संवैधानिक उपबन्धों पर लिखित बहस जमा कर चुके होंगे। मिशन सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ कॉलिन द्वारा लिखित बहस खुद तैयार कर जमा की गई है और शिक्षामित्रों की ओर से दाखिल की गई अब तक की सभी एसएलपी से अलग और संवैधानिक उपबन्धों पर आधारित एसएलपी है। लिखित बहस को भी इसी का आधार दिया गया है।
★आजीविका और मान सम्मान से कोई समझौता नहीं।
©मिशन सुप्रीम कोर्ट।।
Monday, August 15, 2016
भारतीय संविधान के अनु० 19 और 21 में दी गई रोजी रोटी की सुनिश्चितता की आज़ादी।।
जश्ने आज़ादी मुबारक, स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभ-कामनाएँ प्रेषित करते हुए "मिशन सुप्रीम कोर्ट" के वर्किंग ग्रुप मेंबर्स रबी बहार, केसी सोनकर और माधव गंगवार का चिंतन:-
प्रदेश के लगभग 172000 शिक्षमित्रों ने पिछले 16 वर्षों से अपनी रोजी रोटी की सुनिश्चितता की आज़ादी गिरवी रखी हुई है।
2001से 2014 तक 14 सालों से शिक्षामित्रो को प्रदेश की सरकारों द्वारा भारतीय संविधान की धारा 19 और 21 में दी गई आजादी की रोजी रोटी की सुनिश्चितता की अवधारणाओं का उल्लंघन किया जाता रहा। और फिर 2014 में राज्य सरकार ने अपना कर्तव्य निभाते हुए शिक्षामित्रों को अध्यापक बना के उनका संविधान प्रदत्त अधिकार देने का प्रयास किया। लेकिन इसपर अपने ही बीएड/बीटीसी बेरोज़गार भाइयों की बुरी नज़र पड़ी और हाई कोर्ट के फैसले ने उनके परिवार के सदस्यो को पीड़ित किया, क्योंकि उनकी रोजी रोटी कोर्ट के रवैए के कारण छीन ली गई तो राज्य सर्कार ने मामला सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख पेश किया। जबकि देश के विभिन्न हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दर्जनों फैसले आजीविका के अधिकार की रक्षा के लिए दिए गए। जैसे नवंबर 2014 में शिमला हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का ये फैसला कि शिक्षामित्रों को नियमित किया जाये। और इनकी सेवाओं को सम्मान दिया जाये।
मार्च 2015 में उत्तरप्रदेश राज्य बनाम चरणसिंह के मामले में फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति वी. गोपाला गौडा ने कहा कि भारतीय संविधान की धारा 19 और 21 में दी गई आजादी रोजी रोटी की सुनिश्चितता की अवधारणाओं का प्रबंधकों द्वारा उल्लंघन किया गया है। उसके परिवार के सदस्य पीड़ित हैं, क्योंकि उनकी रोजी रोटी प्रबंधकों के मनमाने रवैए के कारण छीन ली गई है। ओल्गा टेलिस व अन्य बनाम मुंबई म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय को उद्धृत करते हुए न्यायालय ने प्रबंधकों को लताड़ लगाई, ‘... क्या जीने के अधिकार में आजीविका का अधिकार शामिल है। हमें इसका एक ही उत्तर दिखता है कि यह शामिल है।
और फैसला आजीविका के अधिकार के पक्ष में दिया।
संविधान के अनुच्छेद 21 का दायरा बेहद व्यापक है। जीने के अधिकार में महज इतना ही शामिल नहीं है कि किसी भी व्यक्ति का जीवन सजा-ए-मौत के द्वारा छीना जा सकता है। जीने का अधिकार मात्र एक पहलू है। इसका उतना ही महत्वपूर्ण पहलू है कि आजीविका का अधिकार जीने के अधिकार में शामिल है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति आजीविका के साधनों के बिना जी नहीं सकता। यदि आजीविका के अधिकार को संविधान प्रदत्त जीने के अधिकार में शामिल नहीं माना जाएगा तो किसी भी व्यक्ति को उसके जीने के अधिकार से वंचित करने का सबसे सरल तरीका है, उसके आजीविका के साधनों से उसे वंचित कर देना। ऐसी वंचना न केवल जीवन को निरर्थक बना देती है अपितु जीवन जीना ही असंभव बना देती है। किसी व्यक्ति को उसके आजीविका के अधिकार से वंचित करने का मतलब है, उसे जीवन से वंचित कर देना।
हम आज जब आज़ादी की स्वतंत्रता की चर्चा करते हैं तो हमे अपने बहुमूल्य 16 सालों की याद आती है उस जवानी की याद आती है जो हमने संविधान के अनुच्छेद 21क द्वारा प्रदत्त अधिकार को देश के कर्णधारो तक पहुँचाने में खर्च कर दिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21, व् 39 के तहत “जीने के अधिकार” की व्याख्या करते हुए अपने तमाम निर्णयों में कहा है संविधान के अनुच्छेद 39 के तहत सरकार का यह कर्तव्य है कि वह सभी को आजीविका उपलब्ध कराये। प्रभावितों की आजीविका खत्म होने से अनुच्छेद 39 का भी उल्लंघन होगा।
अब जबकि आम शिक्षामित्र अपने अधिकार के लिए अपने "मिशन सुप्रीम कोर्ट" के साथ लड़ रहा है तो सर्वोच्च न्यायालय से हम अपना संविधान प्रदत्त अधिकार ले कर रहेंगे और अगली 26 जनवरी और 15 अगस्त पूर्ण मनोयोग से मनाएंगे।।क्योकि
★आजीविका और मान सम्मान से कोई समझौता नहीं।।
©मिशन सुप्रीम कोर्ट।।
Sunday, August 14, 2016
बीएड बेरोज़गार प्राथमिक शिक्षक बनने के हक़दार ही नहीं हैं!!
क्या कारण है? बीएड, बीटीसी बेरोज़गार नेता पिछले कई माह से लगातार अनुच्छेद 21क को लेकर पोस्ट लिखते आ रहे हैं, आइये इसका खुलासा करते हैं।
दरअसल इन लोगों की अपील का आधार और निर्भरता ही इसी पर है। उन्नीकृष्णन केस के क्रम में संविधान पीठ ने राज्यों को अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का प्राविधान किया चूँकि बिना शिक्षकों के ये संभव नहीं है इसलिये ये लोग अपनी नियुक्ति न होने को मौलिक अधिकार बताते हैं। बात तो काफी हद तक ठीक भी है लेकिन ये मौलिक अधिकार वरीयता क्रम में आखरी है।
इस संदर्भ में सर्वप्रथम अधिकार शिक्षामित्रों का फिर बीटीसी का। यहाँ बीएड का नाम लिखना धृष्टता होगी। जो हम नहीं करेंगे। चूँकि बीएड कभी भी बेसिक शिक्षा के लिए नहीं माँगा गया बल्कि एनसीटीई ने अपने रेगुलाशन्स में प्राथमिक शिक्षक नियुक्ति के लिए बीएड को इनवैलिड और इल्लीगल बताया है।
साथ टेट के सम्बन्ध में भी एनसीटीई का स्पष्ट मत है:-
पैरा 9 B
qualifying the TET would not confer a right on any person for recruitment/employment as it is only one of the eligibility criteria for appointment.
अर्थात टेट पास कर लेने से कोई व्यक्ति नोकरी पाने का अधिकारी नहीं होगा बल्कि ये एक पात्रता मात्र है।
अब बात करते हैं रिक्त पदों की।
इन बेरोज़गारों ने रिक्त पदों पर अपनी नियुक्ति की मांग की है। हमने इन याचिकाओं का अध्ययन करने पर ये पाया:-
there are more that 4.86 lacs vacant posts in class I to V. The true typed copy of decision of state Assembly dated 14.02.2014
साफ़ है इनलोगो ने अपनी याचिकाओं में 14 फरवरी 2014 के शिक्षामित्रों के समायोजन के कैबिनेट डिसीजन को आधार बनाया है।
ये भूल कर की 170000 पोस्ट को राज्य सरकार रिजर्व कर चुकी थी और 2011 से 2016 तक लगातार इन पदों पर केंद्र द्वारा मानदेय और वेतन की संस्तुति होती रही है।
●इन्हें ये भी नहीं पता कि ये सभी पद केंद्र सरकार के एसएसए कैडर में रखे गए थे और ये राज्य के कैडर की रिक्तियां नहीं थी। राज्य कैडर की रिक्तियों पे वर्तमान में बीटीसी की भर्ती गतिमान है। अवशेष 14000 की सीटें अभी भी सुरक्षित हैं।
"मिशन सुप्रीम कोर्ट" के वर्किंग ग्रुप मेंबर्स रबी बहार, केसी सोनकर और माधव गंगवार ने ये पड़ताल की कि इन सब "याचिकाओं" में याचियों ने शिक्षामित्रों को हटाने के लिए किस बिंदु को आधार बनाया है? तो वह आधार ये है :-
There was also a challenge to a further Government Order dated 19.06.2014 implementing the decision of the State Government to absorb Shiksha Mitras into regular service.
अर्थात 19 जून 2014 को जारी समायोजन आदेश को चुनौती दी गई है। कहने का अर्थ ये कि 16 क को आधार बना कर बार बार हमला किया गया है।
और हमने अपने वरिष्ठ वकील डॉ कॉलिन गोन्साल्विस के माध्यम से इन सब बिन्दुओ का मुंह तोड़ जवाब देने की तैयारी की है। क्योकि
★आजीविका और मान सम्मान से कोई समझौता नहीं।।
©मिशन सुप्रीम कोर्ट।
Thursday, August 11, 2016
बीएड/बीटीसी बेरोज़गारों का दूरस्थ बीटीसी रद्द करवाना दिवा स्वप्न है।
दूरस्थ बीटीसी प्रशिक्षण के सन्दर्भ में कुछ शुलभ-शौचालय रूपी धूर्तों ने जो भ्रांतियां फैलाई हैं उनका संक्षिप्त रूप से निराकरण करने की चेष्टा कर रहे हैं, आशा करते हैं आप इसपर गंभीरता से विचार करेंगे!
1. शिक्षामित्रों का प्रशिक्षण क्या हैं?
उ०- 1 अप्रैल 2010 को जब पूरे देश में आरटीई एक्ट लागू हो गया तो जून 2010 में केंद्र सरकार द्वारा एक गाइड लाइन राज्य सरकार को भेजी गई जिस में कहा गया कि राज्य के पास जो भी "अप्रशिक्षित शिक्षक" हों उनको 6 माह में प्रशिक्षण शुरू कराया जाये। चूँकि आरटीई लागू हो चुका है। साथ ही एक प्रोफार्मा भी भेजा गया। जिस में सभी शिक्षकों का ब्यौरा था।
राज्य द्वारा लगभग 172000 शिक्षामित्रों का ब्यौरा केंद्र की राज्य प्रतिनिधियों की बैठक और बजट प्रस्ताव की बैठक में प्रस्तुत किया। और दिसम्बर 2010 में इन अप्रशिक्षित अध्यापकों अर्थात शिक्षामित्रों के प्रशिक्षण का प्रस्ताव एनसीटीई को भेजा गया जो स्वीकार नहीं हुआ और पुनः जनवरी 2011 में संशोधित प्रस्ताव भेजा गया जिसे एनसीटीई द्वारा मंजूरी दे दी गई।
तब राज्य द्वारा केंद्र को अवगत कराया गया कि राज्य को 124000 स्नातक शिक्षामित्रों को एनसीटीई प्रशिक्षण की स्वीकृति दे चुकी है और इन्हें प्रशिक्षण दे कर नियमित किया जायेगा।अवशेष पर स्नातक होने पर विचार होगा। और केंद्र ने वर्ष 2011 में प्रशिक्षण का बजट पास कर दिया।
शिक्षामित्रों को दूरस्थ माध्यम से डीएलएड/बीटीसी प्रशिक्षण प्रदान करने की अनुमति प्राप्त कर प्रशिक्षण कराना आरम्भ कर 'नियमित शिक्षक' पद समायोजन का आधार स्थापित कर दिया गया! विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उपरोक्त प्रशिक्षण सिर्फ "सेवारत-शिक्षक" अपने शैक्षणिक उन्नयन हेतु ही प्राप्त कर सकते हैं। जिसे इसी परिप्रेक्ष्य में कराया भी गया।
2. मा० सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रशिक्षण पर पारित आदेश क्या हैं?
उ०- वर्ष 2011 में ही अन्य राज्य भी उ प्र राज्य के शिक्षामित्रों की तरह दूरस्थ माध्यम से प्रशिक्षण करवाने के लिए प्रस्ताव भेजने लगे और उक्त राज्यों को भी एससीईआरटीई द्वारा प्रशिक्षण दूरस्थ बीटीसी करवाने के प्रस्तावों को एनसीटीई द्वारा मंजूरी दे दी गई।
उक्त सब की जानकारी माननीय सुप्रीम कोर्ट कार्यालय कमिश्नर के प्रतिनिधित्त्व में पूरा प्रशिक्षण संबंधी पूरा ब्यौरा माननीय सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के सम्मुख रखा गया। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के सम्मुख एक हाई पॉवर कमेटी द्वारा उत्तर प्रदेश के शिक्षामित्रों को शिक्षक बनाने के लिए जो कुछ भी किया गया था यहाँ तक की समायोजन तक की जानकारी सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख रखी।
इस पर माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय ने इस पर टिप्पणी दी कि कमेटी ने प्रशंसनीय कार्य किया है इसका अक्षरशः पालन करवाया जाये।*
3. दूरस्थ बीटीसी प्रशिक्षण की वर्तमान स्थिति?
उ०- वर्तमान समय में प्रशिक्षण की अनुमति देने वाली संस्था NCTE और हाई कोर्ट शिक्षामित्रों के प्रशिक्षण को शिक्षक-पद पर नियुक्ति हेतु राज्य सरकार की तरह वैध मानती है। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण गत दि० ०१ अगस्त को मा० उच्च न्यायालय और राज्य सरकार द्वारा सहर्ष स्वीकार करने पर दूरस्थ बीटीसी प्रशिक्षण प्राप्त शिक्षामित्रों को 16000 बीटीसी प्रशिक्षित शिक्षक नियुक्ति में प्रतिभाग करने हेतु आदेशित कर दिया हैं। अतः अब ऐसे शिक्षामित्र शिक्षक नियुक्ति हेतु भी पात्र हो चुके हैं। "मिशन सुप्रीम कोर्ट" के वर्किंग ग्रुप मेंबर्स रबी बहार, केसी सोनकर, माधव गंगवार और साथियों* ने सुप्रीम कोर्ट बीएड/बीटीसी बेरोज़गारों की ट्रेनिंग पर डाली गई हर याचिका को खारिज करवाने की तैयारी की है। हम लोग शतप्रतिशत आश्वस्त है कि प्रशिक्षण पर कोई हमारा बाल बांका नहीं कर सकेगा।
★आजीविका और मान सम्मान से कोई समझौता नहीं।।
©मिशन सुप्रीम कोर्ट।।
Wednesday, August 10, 2016
शिक्षामित्र तो आरटीई एक्ट के दायरे में आते हैं।।
कितनी अजीब बात है वो लोग जो खुद संविधान के अनुच्छेद 21क और राज्य सरकार की अनुकम्पा से एडहॉक पे नियुक्ति पा चुके हैं या फिर पाने की कोशिश में हैं ऐसे बीएड/बीटीसी बेरोज़गार उन शिक्षामित्रों को 21क पे बहस होगी बता रहे हैं जिन शिक्षामित्रों की नियुक्ति ही 21-A की बाध्यता के कारण हुई।
आइये हम उन तथाकथित बेरोज़गारों के नेताओं का सामान्य ज्ञान बढ़ा दें कि:- अनुच्छेद 21क और उसके अधीन निर्मित आरटीई एक्ट की वैधानिकता पर
पांच जजों की संविधान पीठ जिस में Chief Justice R.M. Lodha Justices A.K. Patnaik, *Dipak Misra, S.J. Mukhopadhaya and Ibrahim Kalifulla शामिल थे, अनुच्छेद 21क पर वृहद् चर्चा कर 174 पृष्ठ का फैसला सुना चुकी है। और अब इस पर किसी ख़ास बहस की गुंजाईश नहीं है। और अगर होगी तो अनुच्छेद 40, 41, और विशेष रूप से 43 पे होगी।
अब आइये हम बीएड/बीटीसी बेरोज़गारों को हाई कोर्ट के फैसले में से वो खंड पढ़वा दें जो इनकी हार का कारण बनेगा। जिसे सीजे ने इन शब्दों में लिखा:-
it would now be necessary to deal with the regulatory provisions contained, firstly in the NCTE Act and the later enactment of the RTE Act of 2009.
अर्थात ये ज़रूरी होगा कि शिक्षामित्र एनसीटीई और आरटीई एक्ट के दायरे में लाये जाएँ।
"मिशन सुप्रीम कोर्ट" के वर्किंग ग्रुप मेंबर्स रबी बहार, केसी सोनकर, माधव गंगवार और साथी* अपने सीनियर वकील डॉ कॉलिन गोंजाल्विस और फ़िडेल सेबेस्टियन के माध्यम से 21क पर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डॉ चंद्रचूर्ण के ही उक्त शब्दों को साक्ष्य और तथ्यों के साथ सिद्ध करने की तैयारी की है।
जाके कोई कह दे, शोलों से, चिंगारी से।।
फूल इस बार खिले हैं, बड़ी तैयारी से।।
हम शिक्षामित्रों को एनसीटीई एक्ट और एनसीटीई के नियमानुसार नियुक्त होना सिद्ध करने में सक्षम हैं।बीएड/बीटीसी बेरोज़गारों के नेता तैयार रहे उनका वास्ता अब आम शिक्षामित्रों से पड़ा है। क्योंकि अब
★आजीविका और मान सम्मान से कोई समझौता नहीं।।
©मिशन सुप्रीम कोर्ट।।
Monday, August 8, 2016
शिक्षामित्रों का भविष्य सुरक्षित है!
"When all else is lost, the future still remains." - Christian Nestell
"जब सब कुछ खत्म हो जाता है, भविष्य तब भी बचा रहता है।"
हाई कोर्ट के फैसले के बाद हमने अपनी लड़ाई इसी सिद्धांत पर लड़ने की ठानी। और आज हम आश्वस्त हैं।
ये लड़ाई अब आम शिक्षामित्र की है। जिसने अपनी गलतियों से सीखा और खुद को जीत के क़ाबिल बनाया है। आइये बताते हैं कैसे?:-
शिक्षमित्रों की ओर से दाखिल हलफनामे का बिंदु था:-
Whether the Government Order dated 26 May 1999 can be regarded
as a valid exercise of power under Article 162 of the Constitution, where
the Service Rules of 1981 were silent in regard to the appointment of
untrained teachers;
अर्थात- यद्दपि 1981 के सेवा नियम अप्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति के संबंध मे खामोश थे। ऐसे में
दिनांक 26 मई 1999 के आदेश को संविधान के अनुच्छेद 162 की शक्ति का मान्य प्रयोग माना जा सकता है।
शिक्षामित्रों के पैरवीकारों की और से दाखिल हलफनामे में कहा गया कि शिक्षामित्रों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 162 के परन्तुक द्वारा मानी जाए।
आइये पहले अनुच्छेद 162 को समझते हैं।।
सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 162 की व्याख्या करते हुए यह धारित किया है कि अनुच्छेद 162 के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग केवल उन स्थानों पर हो सकता है जहां संसद अथवा विधानसभा द्वारा पारित कोई कानून उपलब्ध न हो। जहां कोई कानून उपलब्ध हो वहां उस कानून के विपरीत कोई भी परिपत्र अनुच्छेद 162 के अंतर्गत जारी नहीं किया जा सकता।
अब जबकि हम सब जानते हैं कि शिक्षामित्र योजना 1999 में राज्यपाल की अनुच्छेद 309 की शक्तियों का प्रयोग कर लागू की गई तो ये अनुच्छेद 162 के तहत कैसे आ गई।
बीएड/बीटीसी बेरोज़गारों के वकील ने शिक्षामित्रों के हलफनामे की इसी कमी को पकड़ा और उमादेवी केस को सामने ला के रख दिया।
बस इतना करना था कि शिक्षामित्रों का पूरा का पूरा केस धराशायी हो गया।
अभी भी बीएड/बीटीसी बेरोज़गार अपनी पोस्ट्स में हमें उमादेवी केस समझाते रहते हैं।
उनकी इस ग़लतफ़हमी को होने वाली सुनवाई में मिशन सुप्रीम कोर्ट समूह के रबी बहार, केसी सोनकर, माधव गंगवार और साथी* वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ कॉलिन गोंजाल्विस माध्यम से दूर कर देंगे।
अनुच्छेद 162 के स्थान पर 309 पुनर्स्थापित होगा। शिक्षामित्र शिक्षक हैं और शिक्षक ही रहेंगे।
बीएड/बीटीसी बेरोज़गारो के दिवा स्वप्न कभी पुरे नहीं होंगे।
यहाँ हम आप सब साथियों को पुनः आश्वस्त करते हैं कि हमने हाइकोर्ट में हुई अपनी सभी कमियों को चिन्हित कर लिया है और उनका इलाज भी खोज रखा है। अब हम हाई कोर्ट के उन शिक्षामित्रों के अन्य पैरवीकारों की गलतियों को नहीं दोहराने वाले जो उन्होंने कीं। और जीत के प्रति आश्वस्त हैं।
★आजीविका और मान सम्मान से कोई समझौता नहीं।।
©मिशन सुप्रीम कोर्ट।।
Saturday, August 6, 2016
शिक्षमित्रों का मिशन सुप्रीम कोर्ट अब जीत की ओर!!
बीएड/बीटीसी बेरोज़गारों ने पिछले 5 सालों से लगातार दो सवालों पे फोकस किया और शिक्षामित्रों को हाईकोर्ट में मात दे दी।
और वो दो सवाल हैं:-
◆शिक्षामित्र दूरस्थ बीटीसी प्रशिक्षण अवैध क्यों नहीं है?
◆शिक्षमित्र अप्रशिक्षित अध्यापक है या संविदा कर्मी/स्वयंसेवी शिक्षा सहयोगी?
अब सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ इन्ही 2 सवालों के इर्द गिर्द पूरी बहस होना है।
अब मामले के दूसरे पहलु पर गौर करते हैं। शिक्षामित्रों की कोर्ट पैरवी के नाम पर धन उगाही करने वाली टीमें अब तक इन दोनों सवालों पर चुप्पी साधे हुए हैं।
ज़ाहिर है उनके पास कहने को कुछ नहीं है। यहाँ सवाल गोपनीयता का नहीं है क्योंकि इस पर हाईकोर्ट आर्डर के दर्जन भर पन्ने रंगे पड़े हैं। इसके वावजूद मिशन सुप्रीम कोर्ट समूह के अलावा सभी शिक्षामित्र पैरवीकार वो ही तथ्य पकडे बैठे हैं जो राज्य सरकार हाईकोर्ट में रख चुकी है।
लीजिये हम आप के सामने रखते हैं।
राज्य सरकार ने पक्ष रखा कि शिक्षामित्रों का प्रशिक्षण एनसीटीई के नियम अनुसार कार्यरत शिक्षकों के लिए है।
open and distance learning courses provided for the imparting of training to 'working teachers'.
और शिक्षामित्र कार्यरत शिक्षक हैं।
◆मगर राज्य सरकार का ये तर्क कोर्ट ने रद्द कर दिया,
आखिर क्यों ?
इसके बाद फिर एक और दिलचश्प बात कही कि
शिक्षामित्रों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 45 का पालन करते हुए भारत सरकार के आदेशों के अनुपालन में की गई और इनकी योग्यता का निर्धारण भी उसी के नियमानुसार किया गया।
State Government of appointing Shiksha Mitras was in order to implement the provisions of Article 45 of the Constitution and in pursuance of the policy of SSA which was implemented by the Union Government.
◆उपरोक्त तथ्यों के कोर्ट में रखे जाने के वावजूद समायोजन क्यों रद्द किया गया?
कुल मिलाकर राज्य सरकार और शिक्षामित्र पैरवीकार मिलकर भी उन दोनों सवालों के संतुष्टिपूर्ण जवाब नहीं दे सके। अब चूँकि लिखित बहस का तरीका अपना कर कोर्ट ने मुकद्दमा अंतिम चरण में लगा दिया है।
वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में भी यथास्थिति है वर्ना क्या कारण है कि "मिशन सुप्रीम कोर्ट" वर्किंग ग्रुप मेंबर्स रबी बहार* & केसी सोनकर, माधव गंगवार और साथियों के अलावा इस मुद्दे पर कोई तथ्य नहीं रख सका है। मिशन सुप्रीम कोर्ट समूह ने इन दोनों सवालों पर पूरी रिसर्च कर सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों, राज्य सरकार की नियमावली व् आदेशों, संवैधानिक उपबन्धों और केन्दीय क़ानूनों से जवाब तैयार कर अपने वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ कॉलिन गोन्साल्विस को सौंपे हैं। और यही कारण है कि हम अपनी जीत के प्रति आश्वस्त हैं।
★आजीविका और मान सम्मान से कोई समझौता नहीं।।
©मिशन सुप्रीम कोर्ट।।
Thursday, August 4, 2016
शिक्षामित्रों को बीएड/बीटीसी बेरोज़गारों की तरह पात्रता सिद्ध करने की ज़रूरत नहीं है।।
★शिक्षामित्रों को बीएड/बीटीसी बेरोज़गारों की तरह पात्रता सिद्ध करने की ज़रूरत नहीं है।
ये एक ऐसा सत्य है जिसे बीएड/बीटीसी बेरोज़गारों के स्वयंभू और तथाकथित आरटीई एक्टिविस्ट नेता स्वीकारना नहीं चाहते। बल्कि ये कहना ज़्यादा ठीक होगा कि चंदे के धंधे के कारण मानना नहीं चाहतेहैं।
एक सामान्य समझ रखने वाला व्यक्ति भी ये स्वीकार करेगा कि कोई भी पात्रता परीक्षा नौकरी पाने के इच्छुक व्यक्ति को देना होती है न कि 15 साल से कार्यरत शिक्षक को।
मीडिया में लगातार टेट से छूट मिलने या न मिल पाने के समाचार देखने सुनने को मिलते हैं। जबकि ये सभी स्वीकार करते हैं कि शिक्षामित्र पूर्व नियुक्त शिक्षक हैं।
आईये बीएड/बीटीसी बेरोज़गारों का ज्ञानवर्धन करते हैं:-
माननीय सुप्रीम कोर्ट कार्यालय कमिश्नर और एमएचआरडी एनसीटीई प्रतिनिधियों ने अब से ठीक तीन साल पहले तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को शिक्षामित्रों को सेवारत शिक्षक बताते हुए अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट को एमएचआरडी भारत सरकार ने अपने हलफनामे के साथ साथ अनुच्छेद 21क को लागू करने के लिए की गई कार्यवाही का विवरण भी माननीय सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किया।
●ये सब साक्ष्य "मिशन सुप्रीम कोर्ट" के वर्किंग ग्रुप मेंबर्स रबी बहार, केसी सोनकर और साथियों* ने अपने अधिवक्ता डॉ कोलिन गोन्साल्विस को उपलब्ध करवाये हैं।
हमें उम्मीद है कि ये नेता ये मानने से इनकार कर देंगे।
चलिए एक और खुलासा करते हैं।
◆बीएड/बीटीसी बेरोज़गारों ने हाई कोर्ट इलाहबाद के मुख्य न्यायाधीश के 12 सितम्बर के फैसले को इतने आक्रामक रूप में प्रचारित प्रसारित किया कि शिक्षामित्र इसी फैसले को सब कुछ मान बैठे जबकि इस फैसले कुछ माह पहले इन्ही बिन्दुओ जैसे नियुक्ति नियम विरुद्ध है, आरक्षण का पालन आदि इत्यादि पर हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला शिक्षामित्रों के पक्ष में आ चुका है। लेकिन इसके विषय में कोई ज़ुबान नहीं खोलता, न शिक्षमित्र नेताओं को पता न बेरोज़गारों को।
शिमला हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने अपने फैसले में कहा कि एक सप्ताह में जो भी लोग हैं उन्हें नियमित किया जाये। वहां भी बेरोजगार इस बात पर सर पटक रहे हैं। हमारी पूरी सहानुभूति बीएड/बीटीसी बेरोज़गारों के साथ है। लेकिन ये कहाँ का न्याय और नैतिकता है कि कार्यरत शिक्षक को हटाओ और इन बेरोज़गारों को लगाओ।
मिशन सुप्रीम कोर्ट समूह कोर्ट में शिक्षामित्रों को 23 अगस्त 2010 की अधिसूचना से पूर्व नियुक्त शिक्षक सिद्ध करने में सक्षम है और इसलिये शिक्षामित्रों को किसी पात्रता परीक्षा(टेट) देने की ज़रूरत नहीं है। न ही किसी टेट से छूट के पत्र की। भ्रामक खबरों पर ध्यान न दें।
★आजीविका और मान सम्मान से कोई समझौता नहीं।।
©मिशन सुप्रीम कोर्ट।